1. हिन्दी समाचार
  2. उत्तर प्रदेश
  3. भ्रष्ट रवि लवानियां पहले भी लूट चुका है मुज़फ्फर नगर, करोड़ों का कर चुका है घपला!

भ्रष्ट रवि लवानियां पहले भी लूट चुका है मुज़फ्फर नगर, करोड़ों का कर चुका है घपला!

आगरा, लखनऊ, मुजफ्फरनगर, झांसी और कानपुर में कूड़ा निस्तारण से जुड़े ठेकों को लेकर रवि लवानिया और Environment Techno से संबंधित गंभीर आरोप सामने आए हैं। जानिए क्या हैं पूरे मामले में उठे सवाल।

By: BS Yadav  RNI News Network
Updated:
भ्रष्ट रवि लवानियां पहले भी लूट चुका है मुज़फ्फर नगर, करोड़ों का कर चुका है घपला!

स्वच्छ भारत मिशन का उद्देश्य देश को स्वच्छ और कचरा मुक्त बनाने के साथ शहरों में बेहतर कूड़ा प्रबंधन व्यवस्था विकसित करना है। इसके लिए सरकार और स्थानीय निकायों की ओर से हर साल बड़ी धनराशि खर्च की जाती है। लेकिन उत्तर प्रदेश के अलग-अलग शहरों में कूड़ा निस्तारण से जुड़े कुछ ठेकों और कामकाज को लेकर उठ रहे सवाल अब सरकारी व्यवस्था की निगरानी पर भी सवाल खड़े कर रहे हैं। इन मामलों में रवि लवानिया और Environment Techno से जुड़े कामों का नाम सामने आने का दावा किया जा रहा है। आगरा से लेकर लखनऊ, मुजफ्फरनगर, झांसी और अब कानपुर तक अलग-अलग मामलों को जोड़कर कई तरह के आरोप और सवाल सामने रखे जा रहे हैं। हालांकि, इन सभी आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि इस सामग्री के आधार पर नहीं हुई है।

आगरा से शुरू हुई कहानी, कई शहरों तक पहुंची

आगरा में रवि लवानिया से जुड़ी फर्म और कूड़ा निस्तारण के काम को लेकर पहले भी सवाल उठने के दावे किए गए हैं। आरोपों में अधिकारियों के साथ कथित मिलीभगत और सरकारी व्यवस्था में प्रभाव बनाने की बातें कही गई हैं।इसके बाद वर्ष 2021 में लखनऊ में कूड़ा निस्तारण से जुड़े कार्यों के दौरान रवि लवानिया की गतिविधियों को लेकर भी कई दावे सामने आए। सूत्रों के हवाले से CNDS के अधिकारी ओपी सिंह के साथ संपर्क और कथित प्रभाव बनाने की बात कही गई है।कुछ आरोप ऐसे भी हैं जिनमें गिफ्ट, पार्टियों और आर्थिक प्रभाव के माध्यम से संपर्क मजबूत करने तथा कथित तौर पर तकनीकी credentials तैयार कराने की बात कही गई है। इन दावों की पुष्टि के लिए संबंधित दस्तावेजों और आधिकारिक जांच रिपोर्ट का सामने आना जरूरी है।

मुजफ्फरनगर में RDF निस्तारण पर उठे सवाल

इसके बाद मामला मुजफ्फरनगर तक पहुंचने का दावा किया गया, जहां RDF यानी Refuse Derived Fuel के निस्तारण का ठेका सामने आया।नियमों के मुताबिक RDF को निर्धारित प्रक्रिया के तहत उपयोग या निस्तारण के लिए भेजा जाना होता है। लेकिन आरोप लगाया गया कि निस्तारण के बजाय कचरा कथित रूप से नालियों और खुले क्षेत्रों तक पहुंच गया।इस मामले को लेकर मीडिया रिपोर्टिंग के बाद शासन स्तर पर संज्ञान लिए जाने और तत्कालीन प्रमुख सचिव अमृत अभिजात की ओर से जांच कमेटी गठित किए जाने का दावा किया गया है। इसके साथ ही संबंधित भुगतान पर रोक लगाए जाने की बात भी सामने आई।अब बड़ा सवाल यह है कि यदि भुगतान पर जांच के दौरान रोक लगी थी, तो बाद में वह भुगतान किस प्रक्रिया के तहत जारी हुआ? क्या जांच पूरी हुई थी? संबंधित अधिकारियों ने भुगतान जारी करने से पहले किन दस्तावेजों और रिपोर्टों का परीक्षण किया?इन सवालों के स्पष्ट जवाब आधिकारिक दस्तावेजों और जांच रिपोर्ट से ही सामने आ सकते हैं।

अधिकारियों के तबादले के बाद भुगतान का दावा

सूत्रों के हवाले से यह दावा भी किया जा रहा है कि अधिकारियों के तबादले के बाद रुका हुआ भुगतान दोबारा जारी कराने का रास्ता निकाला गया।यदि ऐसा हुआ है तो यह गंभीर प्रशासनिक सवाल होगा कि जांच के दौरान रोकी गई धनराशि किस आधार पर रिलीज की गई और इसके लिए किस स्तर पर अनुमति दी गई।यह भी जांच का विषय हो सकता है कि भुगतान जारी करने से पहले पूर्व में उठाई गई आपत्तियों और जांच के निष्कर्षों को किस तरह देखा गया।

झांसी में भी कूड़ा निस्तारण के काम पर सवाल

मुजफ्फरनगर के बाद झांसी में भी रवि लवानिया से जुड़ी फर्म और कूड़ा निस्तारण के कार्य को लेकर सवाल उठने के दावे किए गए हैं।आरोपों में टेंडर प्रक्रिया, काम की गुणवत्ता, दस्तावेजों और भुगतान से जुड़े सवाल शामिल बताए जा रहे हैं। सूत्रों की ओर से यहां तक दावा किया गया है कि किसी पत्रकार के माध्यम से भुगतान से जुड़े मामले को प्रभावित कराने का प्रयास किया गया।हालांकि इस दावे की भी स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है। ऐसे मामलों में संबंधित विभाग की जांच, भुगतान रिकॉर्ड और आधिकारिक पत्राचार यह स्पष्ट कर सकते हैं कि वास्तविक स्थिति क्या थी।

अब कानपुर के टेंडर पर उठे सवाल

झांसी के बाद हाल में कानपुर नगर निगम में कूड़ा निस्तारण के ठेके को लेकर भी शिकायतों और आरोपों की चर्चा सामने आई है।दावा किया गया है कि जिस काम की दर पहले करीब ₹400 प्रति टन के आसपास थी, उसी प्रकार के काम के लिए कथित तौर पर करीब ₹800 प्रति टन की दर से ठेका दिया गया। साथ ही टेंडर से जुड़ी फर्म का टर्नओवर करीब ₹4 करोड़ से बढ़कर ₹84 करोड़ दिखाए जाने को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं।यदि ये आंकड़े आधिकारिक रिकॉर्ड से पुष्ट होते हैं तो यह जांच का महत्वपूर्ण विषय होगा कि टेंडर की पात्रता निर्धारित करने के लिए किन दस्तावेजों को स्वीकार किया गया और उनका सत्यापन किस स्तर पर किया गया।सूत्रों के हवाले से कानपुर में प्रभावशाली लोगों के माध्यम से टेंडर प्रक्रिया को प्रभावित करने के आरोप भी लगाए गए हैं। एक अन्य दावा यह है कि किसी प्रभावशाली व्यक्ति के भाई को कथित तौर पर पार्टनरशिप में शामिल कर टेंडर हासिल किया गया।इन आरोपों की पुष्टि के लिए कंपनी के साझेदारी दस्तावेज, निविदा रिकॉर्ड, तकनीकी पात्रता और संबंधित अधिकारियों की जांच रिपोर्ट महत्वपूर्ण होगी।

असली सवाल सिर्फ एक कंपनी या व्यक्ति का नहीं

आगरा से लखनऊ, लखनऊ से मुजफ्फरनगर, फिर झांसी और अब कानपुर—अलग-अलग शहरों में कूड़ा निस्तारण के काम से जुड़े मामलों को लेकर यदि एक ही नाम बार-बार सामने आता है तो स्वाभाविक रूप से कई सवाल उठते हैं।

  • टेंडर की पात्रता का सत्यापन किसने किया?
  • तकनीकी credentials की जांच किस स्तर पर हुई?
  • फर्म के दस्तावेजों का सत्यापन कैसे किया गया?
  • काम की गुणवत्ता की निगरानी किस अधिकारी ने की?
  • कूड़े के वैज्ञानिक निस्तारण की पुष्टि कैसे हुई?
  • जांच के दौरान भुगतान पर रोक लगाने के बाद उसे दोबारा किस आधार पर जारी किया गया?
  • अलग-अलग शहरों में सामने आई शिकायतों के बावजूद नई निविदाओं में पात्रता कैसे तय हुई?

इन सवालों का जवाब संबंधित नगर निकायों, विभागीय रिकॉर्ड और स्वतंत्र जांच से ही स्पष्ट हो सकता है।

स्वच्छ भारत मिशन की रकम पर निगरानी जरूरी

कूड़ा निस्तारण सिर्फ ठेके और भुगतान का विषय नहीं है। इसका सीधा संबंध शहरों की स्वच्छता, पर्यावरण और आम लोगों के स्वास्थ्य व जीवन की गुणवत्ता से है। इसलिए यदि किसी कूड़ा निस्तारण परियोजना में अनियमितता, फर्जी दस्तावेज, काम में लापरवाही या नियमों के उल्लंघन के आरोप सामने आते हैं तो उनकी निष्पक्ष जांच जरूरी है।

इन टॉपिक्स पर और पढ़ें:
Hindi News से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए हमें गूगल न्यूज़, फेसबुक, यूट्यूब और ट्विटर पर फॉलो करे...