आजमगढ़। घाघरा नदी के लगातार बढ़ रहे जलस्तर ने आजमगढ़ के बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में प्रशासन और ग्रामीणों की चिंता बढ़ा दी है। नदी में कई दिनों से तीन लाख क्यूसेक से अधिक पानी का प्रवाह बना हुआ है। जलस्तर बढ़ने के कारण बांध के भीतर बसे करीब 134 गांवों में से फिलहाल छह से सात गांव बाढ़ की चपेट में बताए जा रहे हैं। कई संपर्क मार्गों और पुलियों पर पानी पहुंचने से ग्रामीणों का आवागमन भी प्रभावित हुआ है।
बाढ़ खंड के अधिशासी अभियंता वीरेंद्र सिंह के अनुसार, आजमगढ़ में बाढ़ की स्थिति पर मुख्य रूप से टोंस और घाघरा नदियों का प्रभाव रहता है। मौजूदा समय में टोंस नदी के आसपास कटाव की समस्या बनी हुई है, जबकि घाघरा का जलस्तर लगातार ऊपर जा रहा है। बैरागन मार्ग के आसपास पानी जमा होने और नदी के बढ़ते जलस्तर से प्रभावित क्षेत्र का दायरा भी बढ़ रहा है। अधिकारियों के मुताबिक अभी करीब छह गांव बाढ़ से प्रभावित हैं।
बाढ़ के पानी के फैलने से कई ग्रामीण संपर्क मार्गों और पुलियों पर पानी पहुंच गया है। इसके चलते लोगों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाने में परेशानी हो रही है। ग्रामीणों की आवाजाही को देखते हुए प्रशासन ने प्रभावित इलाकों में नावों की व्यवस्था की है। हालांकि, स्थानीय स्तर पर सामने आ रही तस्वीरें प्रशासनिक दावों और जमीनी स्थिति के बीच अंतर की ओर भी इशारा कर रही हैं। ग्रामीणों और स्कूली बच्चों को पानी के बीच नाव से आवागमन करते देखा जा रहा है, जिससे उनकी सुरक्षा को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।
बाढ़ की स्थिति पर नजर रखने के लिए जिला प्रशासन ने 10 बाढ़ चौकियां स्थापित की हैं। राजस्व विभाग की टीमें इन चौकियों के माध्यम से प्रभावित क्षेत्रों की निगरानी कर रही हैं। प्रशासन का कहना है कि जरूरत के अनुसार प्रभावित लोगों तक राहत और सहायता पहुंचाई जा रही है। इसके अलावा बांधों पर चिकित्सकीय व्यवस्था भी उपलब्ध कराने की बात कही गई है। आपात स्थिति से निपटने के लिए संबंधित विभागों की टीमें सक्रिय हैं। बाढ़ खंड के कर्मचारी बांधों और रेगुलेटरों की स्थिति पर लगातार निगरानी रख रहे हैं।
अधिशासी अभियंता के मुताबिक शनिवार सुबह जलस्तर में करीब पांच सेंटीमीटर का अंतर दर्ज किया गया। स्थिति को नियंत्रित रखने के लिए रेगुलेटर खोले गए और पानी को नदी की ओर प्रवाहित किया गया। अधिकारियों का उद्देश्य बांध पर पड़ने वाले अतिरिक्त दबाव को कम करना और किसी संभावित नुकसान को रोकना है। विभागीय टीमें जलस्तर के साथ-साथ बांध और रेगुलेटरों की लगातार निगरानी कर रही हैं।

आजमगढ़ में बाढ़ कोई नई समस्या नहीं है। हर साल बारिश के मौसम में घाघरा और टोंस नदी के आसपास के इलाकों में जलभराव और बाढ़ की स्थिति पैदा होती है। ऐसे में सवाल उठता है कि बार-बार सामने आने वाली इस समस्या का स्थायी समाधान अब तक क्यों नहीं हो सका। बाढ़ नियंत्रण के लिए तटबंधों की मजबूती, कटाव रोकने के उपाय, जल निकासी की बेहतर व्यवस्था और ग्रामीण संपर्क मार्गों को सुरक्षित बनाने जैसे कदम लंबे समय से महत्वपूर्ण माने जाते रहे हैं। इसके बावजूद हर वर्ष बाढ़ आने के बाद राहत और बचाव की व्यवस्थाओं पर निर्भरता दिखाई देती है।
बाढ़ नियंत्रण और राहत कार्यों पर सरकार और संबंधित विभागों की ओर से हर वर्ष बड़ी धनराशि खर्च की जाती है। प्रशासनिक स्तर पर निगरानी और तैयारियों के दावे भी किए जाते हैं, लेकिन बाढ़ के दौरान सामने आने वाली तस्वीरें कई सवाल खड़े करती हैं। ग्रामीणों और स्कूली बच्चों का बढ़े हुए पानी के बीच नाव के जरिए आवागमन करना उनकी मजबूरी और जोखिम दोनों को सामने लाता है। ऐसे हालात में केवल बाढ़ आने के बाद राहत पहुंचाना पर्याप्त नहीं माना जा सकता। जरूरत इस बात की है कि बाढ़ से पहले स्थायी और प्रभावी इंतजाम किए जाएं, ताकि ग्रामीणों को हर साल इसी तरह की परेशानी का सामना न करना पड़े।
फिलहाल घाघरा नदी का बढ़ता जलस्तर प्रशासन के लिए चुनौती बना हुआ है। करीब छह गांवों में बाढ़ का असर बताया जा रहा है और कई रास्ते प्रभावित हैं। प्रशासन की टीमें स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं।अब निगाह इस बात पर है कि नदी का जलस्तर कब सामान्य होता है और प्रभावित गांवों में जनजीवन कब पटरी पर लौटता है। साथ ही स्थानीय लोगों की सबसे बड़ी उम्मीद यही है कि इस बार राहत एवं बचाव के साथ-साथ बाढ़ की समस्या के स्थायी समाधान की दिशा में भी ठोस कदम उठाए जाएं।