उत्तर प्रदेश की राज्यपाल एवं सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय की कुलाधिपति श्रीमती आनंदीबेन पटेल ने वाराणसी स्थित विश्वविद्यालय परिसर में लगभग साढ़े चार करोड़ रुपये की लागत से किए गए विभिन्न संरक्षण एवं आधुनिकीकरण कार्यों का लोकार्पण किया। इस अवसर पर ऐतिहासिक लाल भवन, पुरातत्व संग्रहालय और शताब्दी भवन अतिथि गृह के नवीनीकरण कार्यों को जनता के लिए समर्पित किया गया।
वर्ष 1917 में निर्मित ऐतिहासिक लाल भवन और वर्ष 1998 में स्थापित शताब्दी भवन अतिथि गृह का जीर्णोद्धार मूल वास्तुशिल्प को सुरक्षित रखते हुए किया गया है। राज्यपाल ने भवनों के संरक्षण कार्यों की सराहना करते हुए कहा कि ऐतिहासिक धरोहरों को संरक्षित रखना हमारी सांस्कृतिक जिम्मेदारी है।
राज्यपाल ने विश्वविद्यालय के वर्ष 1950 में स्थापित पुरातत्व संग्रहालय का भी निरीक्षण किया। संग्रहालय में संरक्षित लगभग 7,000 से अधिक दुर्लभ पुरावस्तुएं, प्राचीन मुद्राएं, मूर्तियां और ऐतिहासिक धरोहरें आकर्षण का केंद्र हैं। उन्होंने विशेष रूप से कुषाणकालीन मानव मस्तक सहित अन्य महत्वपूर्ण पुरावशेषों का अवलोकन किया और संग्रहालय के आधुनिकीकरण की सराहना की। उन्होंने विश्वास जताया कि आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित यह संग्रहालय शोधार्थियों, विद्यार्थियों और देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों के लिए ज्ञान और शोध का महत्वपूर्ण केंद्र बनेगा।
इसके बाद राज्यपाल ने सरस्वती भवन पुस्तकालय में राष्ट्रीय पाण्डुलिपि मिशन के अंतर्गत संचालित दुर्लभ पांडुलिपि संरक्षण केंद्र का निरीक्षण किया। यहां सवा लाख से अधिक दुर्लभ पांडुलिपियों के संरक्षण, दस्तावेजीकरण और डिजिटलीकरण का कार्य किया जा रहा है। उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा को सुरक्षित रखने के इन प्रयासों को समय की आवश्यकता बताया।

राज्यपाल ने एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया के CSR फंड से निर्माणाधीन श्रमण विद्या संकाय के जीर्णोद्धार एवं आधुनिकीकरण कार्यों का भी अवलोकन किया। उन्होंने निर्माण कार्य की गुणवत्ता की प्रशंसा करते हुए इसे विश्वविद्यालय की अधोसंरचना को मजबूत बनाने की महत्वपूर्ण पहल बताया। साथ ही दलाई लामा भवन सहित परिसर में चल रहे अन्य विकास एवं संरक्षण कार्यों की भी सराहना की।
अपने संबोधन में राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने कहा कि सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय प्राच्य विद्या और भारतीय सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के साथ आधुनिक सुविधाओं के विकास का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत कर रहा है। उन्होंने कहा कि ऐसे प्रयास भारतीय ज्ञान परंपरा को आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित पहुंचाने के साथ-साथ विश्वविद्यालय को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।