सेक्टर-150 में सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता की दर्दनाक मौत के मामले में जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, वैसे-वैसे कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आ रहे हैं। अब यह खुलासा हुआ है कि जिस स्थान पर हादसा हुआ, वहां मौजूद 90 डिग्री के खतरनाक रोड मोड़ को बाकायदा नोएडा अथॉरिटी ने लेआउट प्लान में स्वीकृति दी थी। यह मंजूरी 27 जनवरी 2012 को दी गई थी, जिसे अब गंभीर लापरवाही और संभावित भ्रष्टाचार से जोड़कर देखा जा रहा है।
जानकारी के अनुसार, स्पोर्ट्स सिटी एससी-2 ए-3 के उस प्लॉट के बाहर यह हादसा हुआ, जो एसजेड विजटाउन बिल्डर से जुड़ा बताया जा रहा है। इस प्लॉट का कुल क्षेत्रफल 27,185 वर्गमीटर है। लेआउट प्लान को उस समय नोएडा अथॉरिटी के आर्किटेक्ट प्लानिंग विभाग द्वारा मंजूरी दी गई थी। चौंकाने वाली बात यह है कि पूरे नोएडा में यह एकमात्र ऐसा मामला है, जहां किसी प्लॉट के बाहर 90 डिग्री का तीखा रोड मोड़ स्वीकृत किया गया हो।
लेआउट प्लान के अनुसार, एक ओर 30 मीटर और दूसरी ओर 45 मीटर चौड़ी सड़क दिखाई गई है, जो सीधे 90 डिग्री के एंगल पर कटती हैं। सड़क विशेषज्ञों के अनुसार, इतनी चौड़ी सड़कों पर वाहनों की गति सामान्यतः अधिक होती है और ऐसे में अचानक आने वाला तीखा मोड़ दुर्घटना की आशंका कई गुना बढ़ा देता है।
इंडियन रोड कांग्रेस (IRC) की गाइडलाइंस के अनुसार, ऐसे मोड़ों को हाई रिस्क जोन और एक्सीडेंट प्रोन लोकेशन माना जाता है। नियमों के तहत यहां निम्न व्यवस्थाएं अनिवार्य होती हैं- सुपर एलिवेशन, कैट्स आई और हाई विज़िबिलिटी साइन बोर्ड, क्रैश बैरियर और गार्ड रेल, एडवांस वार्निंग साइन और रोड मार्किंग लेकिन हादसे वाली जगह पर इनमें से एक भी व्यवस्था मौजूद नहीं थी।
सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि जब वर्ष 2012 में यह लेआउट प्लान पास किया गया, तब रोड सेफ्टी ऑडिट क्यों नहीं किया गया। क्या 90 डिग्री के इस खतरनाक मोड़ को सामान्य मोड़ मानकर मंजूरी दे दी गई? रोड सेफ्टी एक्सपर्ट विजय मिश्रा का कहना है कि ऐसे मोड़ को तुरंत ब्लैक स्पॉट घोषित कर IRC मानकों के अनुसार सुधार कार्य किया जाना चाहिए था।
वर्ष 2009 से 2012 के बीच नोएडा अथॉरिटी में मोहिंदर सिंह, राकेश बहादुर और संजीव सरन चेयरमैन व सीईओ के पदों पर रहे। सीएजी ऑडिट रिपोर्ट के मुताबिक यह दौर जमीन आवंटन और लेआउट मंजूरी में सबसे ज्यादा अनियमितताओं वाला रहा है। इसी अवधि में स्पोर्ट्स सिटी एससी-2 के लगभग 300 एकड़ क्षेत्र का आवंटन और लेआउट प्लान पास हुआ। उस समय बीएसपी सरकार के कार्यकाल में बिल्डर-अथॉरिटी-सत्ता के गठजोड़ के आरोप भी सामने आते रहे हैं।
हादसे के स्थान पर वास्तविक स्थिति बेहद चिंताजनक पाई गई न एडवांस वार्निंग साइन बोर्ड, न स्पीड कंट्रोल के इंतजाम, न रंबल स्ट्रिप्स, न क्रैश बैरियर, न ही पर्याप्त रोड मार्किंग… ऐसे में अंधे मोड़ पर ड्राइवर को पहले से सतर्क करने के लिए जरूरी विजुअल संकेत पूरी तरह गायब थे।
युवराज मेहता की मौत ने न सिर्फ सड़क सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि यह भी सोचने पर मजबूर किया है कि क्या यह हादसा केवल दुर्घटना था या सिस्टम की लापरवाही और नियमों की अनदेखी का नतीजा। अब देखना होगा कि जांच में दोषियों की जिम्मेदारी तय होती है या यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाता है।