उत्तर प्रदेश में अप्रैल से जुलाई के बीच पंचायत चुनाव कराना अब मुश्किल नजर आ रहा है। चुनाव से पहले राज्य में एक समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग (OBC Commission) का गठन किया जाएगा। इस संबंध में योगी सरकार ने Lucknow High Court में हलफनामा दाखिल कर स्थिति स्पष्ट की है। सरकार के इस रुख के बाद यह लगभग तय माना जा रहा है कि पंचायत चुनाव निर्धारित समय-सीमा में नहीं हो पाएंगे।
दरअसल, हाईकोर्ट में एक याचिका दाखिल की गई थी, जिसमें मौजूदा पिछड़ा वर्ग आयोग के अधिकारों को चुनौती दी गई थी। इस मामले की सुनवाई जस्टिस राजन राय और जस्टिस अवधेश चौधरी की खंडपीठ कर रही है। सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से बताया गया कि पंचायत चुनाव से पहले एक समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन अनिवार्य है, ताकि आरक्षण व्यवस्था को संवैधानिक रूप से मजबूत बनाया जा सके।
योगी सरकार ने अदालत को अवगत कराया कि पंचायतों में पिछड़ा वर्ग के लिए सीटों का आरक्षण समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट के आधार पर ही तय किया जाएगा। सरकार के अनुसार, आयोग को आंकड़े एकत्र करने, उनका विश्लेषण करने और रिपोर्ट तैयार करने में लगभग दो महीने का समय लग सकता है। ऐसे में पंचायत चुनावों की प्रक्रिया को फिलहाल आगे बढ़ाना संभव नहीं है।
सरकारी हलफनामे के बाद संकेत साफ हैं कि अप्रैल से जुलाई के बीच पंचायत चुनाव कराना व्यावहारिक नहीं होगा। आयोग की रिपोर्ट आने और उसके आधार पर आरक्षण अधिसूचना जारी होने के बाद ही चुनाव कार्यक्रम घोषित किया जा सकेगा। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह फैसला भले ही चुनावी प्रक्रिया को आगे बढ़ाएगा, लेकिन इससे पंचायत चुनावों में आरक्षण व्यवस्था को कानूनी चुनौती से बचाने में मदद मिलेगी।
सरकार का कहना है कि बिना समर्पित आयोग की रिपोर्ट के पंचायतों में पिछड़ा वर्ग आरक्षण तय करने से भविष्य में चुनाव परिणामों पर कानूनी संकट आ सकता है। इसी कारण आयोग गठन को प्राथमिकता दी जा रही है। अब सबकी नजर हाईकोर्ट की अगली सुनवाई और समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग के गठन की प्रक्रिया पर टिकी है, जिसके बाद ही पंचायत चुनाव की नई समय-सीमा तय हो सकेगी।