गोरखपुर। उत्तर प्रदेश के गोरखपुर स्थित गोरखनाथ मंदिर में विजयादशमी का पर्व धार्मिक आस्था, आध्यात्मिक परंपरा और सांस्कृतिक विरासत के अनूठे संगम के रूप में मनाया जाता है। यहां दशहरे पर महायोगी गुरु गोरखनाथ की विशेष पूजा-अर्चना से लेकर विजय शोभायात्रा और भगवान श्रीराम के राजतिलक तक विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान संपन्न किए जाते हैं। गोरक्षपीठ की यह परंपरा धर्म, सत्य और सामाजिक समरसता का संदेश देती है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और गोरक्षपीठाधीश्वर से जुड़ी इन परंपराओं में नाथपंथ की आध्यात्मिक विरासत की झलक देखने को मिलती है। हर वर्ष विजयादशमी पर मंदिर में होने वाले आयोजन श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र रहते हैं।
गुरु गोरखनाथ की पूजा से शुरू होते हैं धार्मिक अनुष्ठान
गोरखनाथ मंदिर में विजयादशमी के दिन सबसे पहले महायोगी गुरु गोरखनाथ की विधिवत पूजा-अर्चना की जाती है। नाथ संप्रदाय में गुरु गोरखनाथ को विशेष आध्यात्मिक स्थान प्राप्त है और श्रद्धालु उन्हें श्रद्धापूर्वक श्रीनाथ जी के नाम से भी पुकारते हैं। परंपरा के अनुसार, गोरक्षपीठाधीश्वर योगी आदित्यनाथ विशेष धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेते हैं। वैदिक मंत्रोच्चार के बीच शक्तिपीठ और मंदिर परिसर में स्थापित विभिन्न देवी-देवताओं के विग्रहों की पूजा की जाती है। इसके साथ ही ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ सहित पूर्व संतों की समाधियों पर श्रद्धा अर्पित करने की परंपरा भी निभाई जाती है। इन अनुष्ठानों के माध्यम से प्रदेशवासियों के सुख, शांति, समृद्धि और कल्याण की कामना की जाती है।
तिलकोत्सव में संतों और श्रद्धालुओं की सहभागिता
गोरक्षपीठ की विजयादशमी परंपरा में तिलकोत्सव का विशेष महत्व है। इस अवसर पर संत, साधु, श्रद्धालु और विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े लोग गोरक्षपीठाधीश्वर से मिलकर आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। यह आयोजन धार्मिक श्रद्धा के साथ गुरु-शिष्य परंपरा और संत समाज के प्रति सम्मान को भी प्रदर्शित करता है। बड़ी संख्या में लोगों की सहभागिता से मंदिर परिसर में उत्सव का विशेष माहौल बनता है।
विजय शोभायात्रा में दिखती है आस्था और लोकसंस्कृति की झलक
विजयादशमी पर गोरखनाथ मंदिर से निकलने वाली पारंपरिक विजय शोभायात्रा इस आयोजन का प्रमुख आकर्षण होती है। इसमें धार्मिक उत्साह, पारंपरिक वाद्ययंत्रों और श्रद्धालुओं की भागीदारी से पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठता है। शोभायात्रा के दौरान मानसरोवर मंदिर में पूजा-अर्चना और अभिषेक की परंपरा निभाई जाती है। इसके बाद मानसरोवर रामलीला मैदान में भगवान श्रीराम, माता सीता, लक्ष्मण और हनुमान जी की पूजा की जाती है। धार्मिक अनुष्ठानों के अंतर्गत भगवान श्रीराम का राजतिलक भी संपन्न होता है। यह परंपरा अधर्म पर धर्म और असत्य पर सत्य की विजय के संदेश को साकार करती है।
विजयादशमी पर सामाजिक समरसता का संदेश
गोरक्षपीठ में दशहरे का आयोजन केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि सामाजिक सद्भाव और सामूहिक सहभागिता को भी महत्व देता है। परंपरागत आयोजनों और सामूहिक प्रसाद-भोज के माध्यम से समाज के विभिन्न वर्गों के लोगों को एक साथ आने का अवसर मिलता है। इस परंपरा का उद्देश्य आपसी भाईचारे, सेवा, करुणा और सामाजिक एकता की भावना को मजबूत करना भी है। यही वजह है कि गोरखनाथ मंदिर की विजयादशमी धार्मिक आस्था के साथ सामाजिक समरसता का प्रतीक मानी जाती है।
धर्म, सत्य और लोककल्याण का प्रतीक है गोरक्षपीठ का दशहरा
गोरखनाथ मंदिर में विजयादशमी के अवसर पर गुरु गोरखनाथ की आराधना, संतों का सम्मान, विजय शोभायात्रा और भगवान श्रीराम के राजतिलक की परंपराएं भारतीय संस्कृति की समृद्ध विरासत को दर्शाती हैं। यह पर्व लोगों को संदेश देता है कि जीवन में सत्य, न्याय और धर्म के मार्ग पर चलना सबसे महत्वपूर्ण है। अहंकार और अधर्म का अंत तथा लोककल्याण की भावना ही विजयादशमी का वास्तविक संदेश है। गोरक्षपीठ की यह विशिष्ट परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही धार्मिक मान्यताओं और सांस्कृतिक मूल्यों को जीवंत बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

