मौनी अमावस्या के पावन अवसर पर प्रयागराज में हुआ मौन स्नान सनातन संस्कृति की गहराई और उसकी अनुशासित परंपरा का जीवंत उदाहरण बनकर सामने आया। संगम तट पर उमड़े करोड़ों श्रद्धालुओं के बीच न शोर था, न दिखावा-बस मौन, श्रद्धा और नियमों का पालन। यह दृश्य अपने आप में भारतीय संस्कृति का अद्भुत स्वर बन गया।
हर घंटे बनता रहा आस्था का नया कीर्तिमान
शनिवार और रविवार की दरमियानी रात से ही गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के पावन संगम पर श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ा। मौन धारण कर स्नान करने वालों की संख्या हर घंटे नए रिकॉर्ड रचती रही। आसपास के गांवों से सिर पर गठरी लेकर पहुंचे श्रद्धालु हों या विशेष ट्रेनों और बसों से आए यात्री-सबका उद्देश्य एक ही था, त्रिवेणी में मौन स्नान।
भक्ति के हुजूम में युवाओं की उल्लेखनीय भागीदारी
इस विशाल जनसमूह में पढ़े-लिखे युवाओं की संख्या विशेष रूप से अधिक नजर आई। युवाओं ने न केवल श्रद्धा के साथ स्नान किया, बल्कि व्यवस्था बनाए रखने, लोगों को रास्ता दिखाने और अनुशासन कायम रखने में भी सक्रिय भूमिका निभाई। यह संकेत था कि सनातन संस्कृति नई पीढ़ी में भी गहराई से रच-बस रही है।
अनुशासन की मिसाल: न शोर, न अव्यवस्था
मौनी अमावस्या के स्नान का सबसे बड़ा आकर्षण रहा श्रद्धालुओं का अनुशासन। कहीं तेज संगीत नहीं, कहीं नारेबाजी नहीं, न ही बैरियर पर चढ़कर हंगामा। हर किसी की बस यही चाह थी कि बिना बोले, बिना किसी बाधा के पवित्र त्रिवेणी में स्नान हो जाए। यह अनुशासन अपने आप में एक बड़ी सीख बन गया।
VIP संस्कृति से दूर, आस्था की सादगी
सोशल मीडिया पर दिखावे और VIP संस्कृति के ठीक उलट, करीब 4.52 करोड़ श्रद्धालुओं ने एक ही दिन में स्नान कर सादगी और संयम की मिसाल पेश की। श्रद्धालुओं ने प्रशासन द्वारा बनाई गई व्यवस्थाओं का पूरी तरह पालन किया और कहीं भी विशेष व्यवहार की अपेक्षा नहीं की।
मन में मां गंगा, आंखों में त्रिवेणी
श्रद्धालुओं के मन में केवल मां गंगा का भाव था और आंखों में पवित्र त्रिवेणी का दर्शन। इस मौन स्नान के दौरान हर किसी ने उस आंतरिक बदलाव को महसूस किया, जो सनातन संस्कृति की आत्मा है-कम बोलना, अधिक अनुभव करना।
हंगामों से दूर, साधना में लीन श्रद्धालु
मणिकर्णिका घाट और अन्य मुद्दों पर चल रही चर्चाओं से अलग, श्रद्धालुओं की रुचि केवल स्नान और साधना में रही। हजारों लोग स्नान के बाद शांति से अपने गंतव्य की ओर लौटते रहे। मीडिया की सुर्खियों से अलग, आस्था का यह सैलाब पूरी तरह अपने लक्ष्य में लीन था।
पंक्तिबद्ध यात्रा: स्टेशन से संगम तक
स्टेशन से संगम, फिर अन्य घाटों तक, स्नान के बाद भंडारों में प्रसाद ग्रहण करना और फिर शांतिपूर्वक घर लौटना-हर चरण में पंक्तिबद्ध व्यवस्था देखने को मिली। मानो श्रद्धालु यह संकल्प लेकर आए हों कि अपने व्यवहार से सनातन संस्कृति की गरिमा को और ऊंचा करेंगे।
सादगी की मिसाल बना किन्नर सनातनी अखाड़ा
किन्नर सनातनी अखाड़े की महामंडलेश्वर ने भी तय नियमों के अनुसार सीमित संख्या में संतों के साथ पैदल ही स्नान किया। न कोई तामझाम, न कोई प्रचार-सिर्फ आस्था और अनुशासन। यह दृश्य भी श्रद्धालुओं के लिए प्रेरणास्रोत बन गया।
तीर्थराज प्रयाग का शाश्वत संदेश
मौनी अमावस्या के दिन प्रयागराज ने सनातन संस्कृति की ऐसी तस्वीर प्रस्तुत की, जो आने वाले समय के लिए मार्गदर्शक है। यदि हर पर्व पर ऐसी ही प्रशासनिक तैयारी हो और श्रद्धालु भी ऐसा ही संयम रखें, तो यह परंपरा और मजबूत होगी। तीर्थराज प्रयाग सदियों से यही संदेश देता आया है-श्रद्धा के साथ अनुशासन और सादगी।

