लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राज्यपाल श्रीमती आनंदीबेन पटेल ने जन भवन परिसर में विकसित ‘गंगासागर नमो नमः’ स्थल पर गंगा आरती में सहभागिता की। शरद पूर्णिमा के अवसर पर आयोजित इस धार्मिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम में जन भवन में कार्यरत अधिकारियों और कर्मचारियों ने अपने परिवारों के साथ हिस्सा लिया। श्रद्धा, भक्ति और उल्लास से भरे इस आयोजन में चांदनी रात के बीच पारंपरिक गरबा नृत्य भी आकर्षण का केंद्र रहा। कार्यक्रम ने भारतीय आध्यात्मिक परंपराओं और लोक-संस्कृति के सुंदर संगम को प्रस्तुत किया। गंगा आरती के माध्यम से मां गंगा के प्रति आस्था व्यक्त की गई, वहीं गरबा नृत्य ने उत्सव में रंग और उमंग भर दी।
गंगोत्री से गंगासागर तक की आध्यात्मिक यात्रा का प्रतीक है परियोजना
जन भवन परिसर में स्थापित ‘गंगासागर नमो नमः’ स्थल मां गंगा की आध्यात्मिक यात्रा को एक ही स्थान पर अनुभव करने की परिकल्पना पर आधारित है। यह पहल भारत की प्राचीन तीर्थ परंपराओं, सांस्कृतिक विरासत और प्रकृति के प्रति सम्मान की भावना को समर्पित है। इस परियोजना का उद्देश्य मां गंगा की पवित्रता, निर्मलता और अविरल प्रवाह के महत्व को रेखांकित करना भी है। यहां आयोजित होने वाली गंगा आरती श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक शांति प्राप्त करने, सामूहिक प्रार्थना में शामिल होने और भारतीय परंपराओं से जुड़ने का अवसर प्रदान करती है। जन भवन परिसर में इस स्थल का उद्घाटन 17 सितंबर को किया गया था। यहां प्रतिदिन शाम को गंगा आरती आयोजित किए जाने की व्यवस्था की गई है। दीप प्रज्ज्वलन, मंत्रोच्चार और सामूहिक आराधना के माध्यम से मां गंगा के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के साथ ही नदियों की स्वच्छता और संरक्षण का संदेश भी दिया जाता है।
शरद पूर्णिमा: चांदनी, आस्था और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का पर्व
भारतीय परंपरा में आश्विन मास की पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है। वर्षा ऋतु के बाद स्वच्छ आकाश, शीतल चांदनी और सुहावने मौसम के कारण इस पर्व का विशेष आकर्षण है। विभिन्न क्षेत्रों में इसे रास पूर्णिमा, कौमुदी महोत्सव और कोजागरी पूर्णिमा जैसे नामों से भी जाना जाता है। धार्मिक मान्यताओं में शरद पूर्णिमा की चांदनी को शुभ और कल्याणकारी माना गया है। इस अवसर पर अनेक घरों में खीर तैयार कर रात में चंद्रमा की रोशनी में रखी जाती है और बाद में उसे प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है। यह परंपरा चंद्रमा के प्रति श्रद्धा के साथ भारतीय जीवनशैली में प्रकृति के महत्व को भी दर्शाती है। दशहरा और शारदीय नवरात्र के बाद आने वाली शरद ऋतु भारतीय संस्कृति में नई ऊर्जा, सकारात्मकता और आध्यात्मिक चिंतन का संदेश देती है। ऐसे अवसरों पर आयोजित धार्मिक कार्यक्रम लोगों को अपनी परंपराओं से जुड़ने और सामूहिक सहभागिता के माध्यम से उत्सव मनाने का अवसर देते हैं।
ब्रज में शरद पूर्णिमा का विशेष धार्मिक महत्व
उत्तर प्रदेश के मथुरा, वृंदावन और ब्रज क्षेत्र में शरद पूर्णिमा का विशेष स्थान है। वैष्णव परंपरा में इस पूर्णिमा की रात्रि को भगवान श्रीकृष्ण की महारास लीला से जोड़कर देखा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इसी पावन रात्रि में श्रीकृष्ण ने राधा और गोपियों के साथ दिव्य रास रचाया था। महारास की कथा प्रेम, भक्ति और ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण का प्रतीक मानी जाती है। ब्रज में इस अवसर पर रासलीला, भजन-कीर्तन और राधा-कृष्ण की पूजा के आयोजन होते हैं, जिनसे पूरा क्षेत्र भक्तिमय वातावरण में सराबोर हो जाता है। ब्रज की एक अन्य प्रचलित मान्यता भगवान शिव से संबंधित है। कहा जाता है कि महारास के दर्शन की इच्छा से भगवान शिव वृंदावन पहुंचे और रास में प्रवेश के लिए उन्होंने गोपी स्वरूप धारण किया। इसी प्रसंग को गोपेश्वर महादेव की परंपरा से जोड़ा जाता है। वृंदावन स्थित गोपेश्वर महादेव मंदिर इस आस्था का महत्वपूर्ण केंद्र है।
गुजरात के गरबा में झलकती है लोक-संस्कृति और सामूहिक उत्साह की भावना
गुजरात में शरद पूर्णिमा को ‘शरद पूनम’ कहा जाता है। इस अवसर पर चंद्रमा की पूजा, भजन-कीर्तन, पारंपरिक व्यंजनों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। गरबा गुजरात की प्रसिद्ध लोक एवं भक्ति परंपराओं में शामिल है, जिसमें संगीत, ताल और गोलाकार नृत्य के माध्यम से उत्सव की खुशी साझा की जाती है। गरबा का संबंध देवी शक्ति की आराधना से भी है। पारंपरिक स्वरूप में छिद्रयुक्त मिट्टी के पात्र के भीतर दीपक रखा जाता है, जिसे ‘गर्भदीप’ कहा जाता है। इसे जीवन, प्रकाश और दिव्य ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है। दीपक के चारों ओर गोलाकार नृत्य सृष्टि के निरंतर चक्र और जीवन की ऊर्जा का सांकेतिक भाव प्रस्तुत करता है। हालांकि गरबा विशेष रूप से नवरात्रि के दौरान व्यापक स्तर पर आयोजित किया जाता है, लेकिन गुजरात की सांस्कृतिक परंपराओं में यह अन्य उत्सवों पर भी आनंद और सामुदायिक मेलजोल का माध्यम बनता है। जन भवन में शरद पूर्णिमा की चांदनी के बीच गरबा का आयोजन इसी सांस्कृतिक उल्लास की झलक प्रस्तुत करता है।
गरबा नृत्य से शारीरिक सक्रियता को भी मिलता है बढ़ावा
गरबा धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व के साथ शारीरिक गतिविधि का भी एक आनंददायक माध्यम है। नृत्य के दौरान की जाने वाली लयबद्ध पदचाल, तालियां और हाथों की विभिन्न मुद्राएं शरीर को सक्रिय रखती हैं। अपनी शारीरिक क्षमता के अनुसार नियमित रूप से गरबा करने से फिटनेस, संतुलन और शारीरिक समन्वय बेहतर बनाने में मदद मिल सकती है। लगातार गतिशील रहने से हृदय और श्वसन संबंधी सहनशक्ति को भी लाभ हो सकता है। इस प्रकार गरबा परंपरा, मनोरंजन और सक्रिय जीवनशैली को एक साथ जोड़ता है।
देश के अलग-अलग राज्यों में शरद पूर्णिमा की विविध परंपराएं
भारत की सांस्कृतिक विविधता शरद पूर्णिमा के विभिन्न क्षेत्रीय स्वरूपों में स्पष्ट दिखाई देती है। अलग-अलग राज्यों में इस पर्व को स्थानीय मान्यताओं, पूजा-पद्धतियों और पारिवारिक परंपराओं के अनुसार मनाया जाता है।
- महाराष्ट्र में कोजागिरी पूर्णिमा: यहां इस पर्व पर रात्रि जागरण, मां लक्ष्मी की पूजा और दूध या मसाला दूध ग्रहण करने की परंपरा प्रचलित है। कई परिवार इस अवसर पर एकत्र होकर उत्सव मनाते हैं।
- पश्चिम बंगाल में कोजागरी लक्ष्मी पूजा: शरद पूर्णिमा के अवसर पर मां लक्ष्मी की आराधना कर परिवार की सुख-समृद्धि और मंगल की कामना की जाती है।
- ओडिशा में कुमार पूर्णिमा: इस पर्व पर विशेष रूप से युवतियां चंद्रमा की पूजा करती हैं और सुख, सौभाग्य तथा उज्ज्वल भविष्य की कामना करती हैं।
- मध्य प्रदेश के सागर में कोजागिरी महोत्सव: लाखा बंजारा झील के तट पर महाआरती, दीपदान और सांस्कृतिक गतिविधियों के माध्यम से पर्व मनाने की परंपरा इस आयोजन को विशेष पहचान देती है।
इन क्षेत्रीय परंपराओं के अलावा देश के अनेक हिस्सों में लोग चंद्रमा की पूजा करते हैं, पारंपरिक पकवान बनाते हैं और परिवार तथा समुदाय के साथ मिलकर पूर्णिमा का उत्सव मनाते हैं।
आध्यात्मिक विरासत और लोक-संस्कृति का संगम बना जन भवन का आयोजन
जन भवन परिसर में ‘गंगासागर नमो नमः’ स्थल पर आयोजित गंगा आरती और शरद पूर्णिमा की रात हुआ गरबा भारतीय संस्कृति के विविध आयामों को एक मंच पर लाने वाला आयोजन रहा। एक ओर गंगा आरती ने आस्था, पवित्रता और नदियों के संरक्षण का संदेश दिया, तो दूसरी ओर गरबा ने लोक-संस्कृति, सामूहिक आनंद और सामाजिक सहभागिता को अभिव्यक्त किया। शरद पूर्णिमा से जुड़ी परंपराएं यह दर्शाती हैं कि भारतीय संस्कृति में प्रकृति, आध्यात्मिकता और सामाजिक जीवन एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। जन भवन का यह आयोजन इसी सांस्कृतिक विरासत को संजोने, पारंपरिक मूल्यों को आगे बढ़ाने और नई पीढ़ी को भारत की समृद्ध परंपराओं से परिचित कराने की दिशा में महत्वपूर्ण संदेश देता है।

