Site icon UP की बात

यूपी में दलित वोट बैंक पर सियासी जंग तेज, क्यों जोर मार रहा बीजेपी का आंबेडकरवाद?

उत्तर प्रदेश की राजनीति में दलित वोट बैंक एक निर्णायक भूमिका निभाता है, जिसकी हिस्सेदारी करीब 22% मानी जाती है। 2027 विधानसभा चुनाव से पहले इस वर्ग को अपने पक्ष में करने के लिए बीजेपी और समाजवादी पार्टी (सपा) के बीच रणनीतिक मुकाबला तेज हो गया है।

सपा प्रमुख अखिलेश यादव अपने ‘PDA’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फार्मूले के जरिए दलित वोटरों को जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। 2024 लोकसभा चुनाव में इस रणनीति का असर भी देखने को मिला, जहां सपा ने 37 सीटें जीतकर बीजेपी को कड़ी टक्कर दी। इसी अनुभव को ध्यान में रखते हुए सपा इस गठजोड़ को और मजबूत करने की दिशा में काम कर रही है।

वहीं दूसरी ओर बीजेपी ने भी दलित समुदाय के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए कई कदम उठाए हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने घोषणा की है कि प्रदेश में बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर की सभी प्रतिमाओं पर छतरियां लगाई जाएंगी और उनसे जुड़े पार्कों का सौंदर्यीकरण किया जाएगा। इसके तहत नोएडा के सेक्टर-95 स्थित दलित प्रेरणा स्थल के नवीनीकरण के लिए 107 करोड़ रुपये की मंजूरी दी गई है।

बीजेपी द्वारा 6 अप्रैल से 14 अप्रैल (आंबेडकर जयंती) तक विशेष कार्यक्रम चलाने की योजना भी इसी रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है। इसके साथ ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) सामाजिक समरसता के माध्यम से दलित समुदाय के बीच विश्वास बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बीजेपी का यह अभियान सपा के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने का प्रयास है। कुल मिलाकर, यूपी में दलित वोट बैंक को लेकर सियासी प्रतिस्पर्धा आने वाले चुनावों में अहम भूमिका निभाने वाली है।

Exit mobile version