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राजा भी हम, प्रजा भी हम: उरई राजकीय मेडिकल कॉलेज के दंगल में ‘खुद’ से ही लड़ती सरकार!

उरई राजकीय मेडिकल कॉलेज में हाल ही में हुए विवाद ने प्रदेश की राजनीति और प्रशासनिक व्यवस्था पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मामला उस समय और चर्चा में आ गया जब सत्ताधारी दल के कार्यकर्ता ही न्याय की मांग को लेकर धरने पर बैठ गए, जबकि केंद्र और राज्य दोनों में उनकी ही सरकार है। मेडिकल कॉलेज सरकारी, डॉक्टर सरकारी, पुलिस सरकारी और शिकायतकर्ता भी सत्ता पक्ष से जुड़े—ऐसे में यह पूरा घटनाक्रम राजनीतिक व्यंग्य जैसा प्रतीत होने लगा।

विवाद के बाद दिनभर प्रदर्शन, नारेबाजी और दबाव की राजनीति चली, जिसके बाद डॉक्टरों पर क्रॉस एफआईआर दर्ज की गई। इसके बाद सत्ता पक्ष के नेताओं ने इसे अपनी जीत के रूप में प्रस्तुत किया, लेकिन असली सवाल यही बना रहा कि जब पूरा प्रशासन सरकार के अधीन है, तो फिर न्याय के लिए धरना देने की नौबत क्यों आई? यह स्थिति प्रशासनिक विफलता और सिस्टम की कमजोर कार्यशैली की ओर इशारा करती है।

राजकीय मेडिकल कॉलेज उरई पूरी तरह सरकारी संस्थान है। ऐसे में अस्पताल की सुरक्षा व्यवस्था, संसाधनों की कमी, स्टाफ की स्थिति और मरीजों की अव्यवस्था की जिम्मेदारी सीधे शासन और प्रशासन पर आती है। सवाल यह भी उठ रहे हैं कि अस्पतालों में डॉक्टरों और तीमारदारों के बीच टकराव रोकने के लिए प्रभावी व्यवस्था क्यों नहीं है। यदि शुरुआत में निष्पक्ष कार्रवाई होती, तो मामला इतना नहीं बढ़ता।

डॉक्टरों पर राजनीतिक दबाव में कार्रवाई किए जाने को लेकर भी बहस तेज हो गई है। स्वास्थ्य सेवाओं में पहले से संसाधनों और दबाव की चुनौतियों से जूझ रहे डॉक्टरों का कहना है कि बिना निष्पक्ष जांच के मुकदमे दर्ज करना उनके मनोबल को तोड़ने वाला कदम है। यही कारण है कि अब डॉक्टर भी आंदोलन के रास्ते पर उतर आए हैं।

इस पूरे प्रकरण ने एक नई राजनीतिक प्रवृत्ति को सामने ला दिया है “सत्ता भी हमारी, विरोध भी हमारा।” जब समस्या आती है, तो सत्ता पक्ष खुद ही अपनी सरकार के खिलाफ प्रदर्शन करता नजर आता है। इससे आम जनता के बीच यह संदेश जाता है कि सरकार के भीतर समन्वय और जवाबदेही की कमी है।

सबसे बड़ा सवाल आम जनता को लेकर खड़ा होता है। यदि प्रभावशाली लोगों को भी न्याय के लिए सड़क पर उतरना पड़ रहा है, तो गांवों और दूरदराज से इलाज कराने आने वाले सामान्य मरीजों की स्थिति क्या होगी? पूरा मामला यह दिखाता है कि सिस्टम के अलग-अलग हिस्से एक-दूसरे के खिलाफ खड़े हैं और सबसे अधिक नुकसान आम नागरिकों को उठाना पड़ रहा है।

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