लखनऊ : एक ओर जहां मुख्यमंत्री योगी आदित्यना के नेतृत्व में सरकार द्वारा विकास और जनकल्याण से जुड़े कई कार्यों की सराहना की जा रही है, वहीं दूसरी ओर प्रदेश की चिकित्सा व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। जानकारी के अनुसार प्रदेश के करीब दस जनपदों में पिछले चार से पांच महीनों से मुख्य चिकित्साधिकारी के पद खाली पड़े हुए है। ऐसे में इन जिलों की स्वास्थ्य व्यवस्थाएं बिना स्थायी मुखिया के ही संचालित हो रही हैं, जिससे प्रशासनिक निर्णयों और स्वास्थ्य सेवाओं के संचालन पर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
सूत्रों के मुताबिक जिन जिलों में लंबे समय से मुख्य चिकित्साधिकारी की तैनाती नहीं हुई है, उनमें हाथरस, बलिया, महराजगंज, जौनपुर, वाराणसी, जालौन, अमरोहा, सोनभद्र,हापुड़ और गाजियाबाद जैसे जिले शामिल हैं। इन जिलों में स्वास्थ्य विभाग की महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां फिलहाल अस्थायी व्यवस्था या अतिरिक्त प्रभार के सहारे चल रही हैं। ऐसे मे बड़े जिलों में नियमित मुख्य चिकित्साधिकारी का न होना स्वास्थ्य योजनाओं के क्रियान्वयन, निगरानी और प्रशासनिक नियंत्रण पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है।
जानकारी के मुताबिक प्रदेश के लगभग आधा दर्जन जिलों में ऐसे अधिकारी मुख्य चिकित्साधिकारी के पद पर कार्यरत हैं जिनके खिलाफ भ्रष्टाचार को लेकर विभागीय अनुशासनात्मक कार्यवाही चल रही है। इनमें कन्नौज,मिर्जापुर और रामपुर जैसे जिले शामिल बताए जा रहे हैं। वही हमीरपुर,प्रयागराज एवं गौतमबुद्धनगर के सीएमओ को हटाने की संस्तुति वहां के जिलाधिकारी भी कर चुके है।
गौरतलब है शासनादेश के अनुसार जिस भी अधिकारी एंव कर्मचारी पर विभागीय अनुशासनात्मक कार्यवाही चल रही होती है उसको ऐसे पदों पर नहीं रखा जा सकता है जब अधिकारी अथवा कर्मचारी पर भ्रष्टाचार सम्बंधित अनुशासनात्मक कार्यवाही चल रही हो उसको तत्काल पद से हटा दिया जाता है जबकि स्वास्थ्य विभाग में ऐसा नहीं किया जा रहा है महीनो बीत जाने के बाद भी अधिकारी अपने पदीय दायित्यों का निर्वहन कर रहे है और जमकर भ्रष्टाचार को बढ़ावा दे रहे है इन मामलों के कारण भी स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे हैं और प्रशासनिक स्थिरता को लेकर चिंताएं सामने आ रही हैं।
सूत्रों की माने तो मुख्यमंत्री कार्यालय द्वारा रिक्त जिलों में मुख्य चिकित्साधिकारी की तैनाती के लिए दर्जनों प्रस्ताव मांगे गए, लेकिन लेकिन अपर मुख्य सचिव स्वास्थ्य की व्यक्तिगत रूचि के कारण अभी तक प्रस्ताव मुख्यमंत्री कार्यालय को नहीं भेजा गया है विभाग के कुछ सूत्रों का कहना है कि अपर मुख्य सचिव, स्वास्थ्य स्तर पर इन फाइलों पर निर्णय लंबित है, जिसके चलते नई तैनातियों की प्रक्रिया अटकी हुई है। हालांकि इस संबंध में आधिकारिक तौर पर कोई पुष्टि नहीं की गई है।
वहीं जनपद मैनपुरी में तैनात मुख्य चिकित्साधिकारी द्वारा कई बार अपने पद से हटने के लिए शासन को लिखित प्रत्यावेदन दिए जाने की बात भी सामने आई है। बताया जा रहा है कि उन्होंने वरिष्ठ अधिकारियों को अवगत कराते हुए स्थानांतरण या पद से मुक्त करने का अनुरोध किया था, लेकिन अब तक इस पर कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है।
मुख्य चिकित्साधिकारी के रिक्त पदों पर विभाग के मुखिया द्वारा तैनाती ना किया जाने पर ऐसे कयास लगाये जा रहे है कि मानो स्थानान्तरण सत्र का इन्तजार किया जा रहा हो ,स्थानान्तरण सत्र के दौरान विभागीय मंत्री और अपर मुख्य सचिव स्वास्थ्य अपने मनमानी तरीके से अपनी झोली भरते हुए अपने लोगों को उनकी मनचाही जनपद में तैनाती दे पाएंगे जबकि महीनों से मुख्य चिकित्साधिकारी के पद रिक्त है इतना ही नहीं, कुछ मामलों में गंभीर एवं असाध्य रूप से बीमार अधिकारियों और कर्मचारियों से संबंधित फाइलों पर भी समय पर निर्णय लिए जाने हेतु मुख्यमंत्री कार्यालय द्वारा प्रस्ताव अथवा पत्रावली मांगी जाती है लेकिन विभाग द्वारा व्यक्तिगत रूचि के चलते ये पत्रावली मुख्यमंत्री कार्यालय को नहीं भेजी जाती उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में जिला स्तर पर स्वास्थ्य व्यवस्था की कमान मुख्य चिकित्साधिकारी के हाथ में होती है। ऐसे में यदि लंबे समय तक यह पद खाली रहता है या विवादों में घिरा रहता है, तो इसका सीधा असर जनपद की व्यवस्था, स्वास्थ्य योजनाओं के क्रियान्वयन और आम जनता को मिलने वाली चिकित्सा सुविधाओं पर पड़ सकता है।
ऐसे में अब देखना यह होगा कि प्रदेश सरकार इन रिक्त पदों को भरने और स्वास्थ्य व्यवस्था में स्थिरता लाने के लिए कब तक ठोस कदम उठाता है जिससे जिलों में स्वास्थ्य सेवाओं का संचालन सुचारू रूप से हो सके और जनता को बेहतर चिकित्सा सुविधाएं मिल सकें या फिर विभागीय मंत्री और अपर मुख्य सचिव स्वास्थ्य की मंशा के अनुरूप स्थानान्तरण सत्र तक इन्तजार करते रहेंगे।
ब्यूरो रिपोर्ट यूपी की बात

