ग्रेटर नोएडा में वर्षों से लंबित किसानों की आबादी भूमि से जुड़े लीजबैक और शिफ्टिंग मामलों के समाधान की दिशा में यमुना एक्सप्रेसवे औद्योगिक विकास प्राधिकरण ने बड़ा कदम उठाया है। प्राधिकरण ने इन विवादों को चार अलग-अलग श्रेणियों में विभाजित कर चरणबद्ध तरीके से निस्तारण करने की कार्ययोजना तैयार की है। इसका मकसद वास्तविक रूप से प्रभावित किसानों को न्याय दिलाना और लंबे समय से चले आ रहे विवादों का स्थायी समाधान निकालना है।
सैटेलाइट मैपिंग से बढ़ा था विवाद
प्राधिकरण की ओर से वर्ष 2012 में आबादी भूमि की पहचान के लिए सैटेलाइट मैपिंग कराई गई थी, लेकिन यह प्रक्रिया कई मामलों में विवाद का कारण बन गई। बताया गया कि मैपिंग से पहले ही कुछ गांवों में आबादी का भौतिक स्वरूप बदल चुका था या उसे हटा दिया गया था, जिससे कई किसानों की जमीन का डिजिटल रिकॉर्ड दर्ज नहीं हो सका।
पुराने अभिलेखों की जांच के बाद भी उलझे मामले
इसके बाद वर्ष 2003-04 तक के पुराने नक्शों और राजस्व अभिलेखों की दोबारा जांच कराई गई, लेकिन हर गांव और हर किसान का मामला अलग होने के कारण समस्या और जटिल हो गई। जानकारी के मुताबिक नोएडा और ग्रेटर नोएडा क्षेत्र में लीजबैक और शिफ्टिंग से जुड़े कुल 367 मामले अब भी लंबित हैं। इनमें 88 प्रकरण लीजबैक से और 279 शिफ्टिंग से संबंधित हैं।
चार श्रेणियों में होगा मामलों का निस्तारण
यमुना प्राधिकरण के सीईओ राकेश कुमार सिंह ने बताया कि सभी मामलों को चार श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है। पहली श्रेणी में वे किसान होंगे, जिन्होंने मुआवजा नहीं लिया है और केवल अपनी आबादी की जमीन वापस चाहते हैं। ऐसे मामलों को प्राथमिकता के आधार पर निपटाया जाएगा।
दूसरी श्रेणी में वे किसान शामिल होंगे, जिन्होंने मुआवजा तो ले लिया है, लेकिन अतिरिक्त भूमि पर कब्जा कर अधिक मांग कर रहे हैं। इन मामलों में बातचीत के जरिए समाधान खोजने की कोशिश की जाएगी।
तीसरी श्रेणी में वे प्रकरण रखे जाएंगे, जिनमें किसानों ने मुआवजा लेने के बावजूद जमीन पर कब्जा बनाए रखा है। ऐसे मामलों में ब्याज सहित धन वसूली पर निर्णय लिया जाएगा।
चौथी और सबसे जटिल श्रेणी में वे किसान होंगे, जिन्होंने अधिक मुआवजा लिया, अतिरिक्त भूमि पर कब्जा किया और अब भी तीन गुना मुआवजे की मांग कर रहे हैं।
किसानों ने लगाए गंभीर आरोप
दूसरी ओर किसानों का आरोप है कि उनकी जमीन विभिन्न विकास परियोजनाओं के लिए अधिग्रहित कर ली गई, लेकिन न तो समय पर पूरा मुआवजा दिया गया और न ही आबादी की जमीन वापस की गई। एक किसान ने बताया कि वर्ष 2011 में उसकी 45 बीघा जमीन अधिग्रहित की गई थी, लेकिन अब तक भुगतान नहीं हुआ।
रिकॉर्ड के आधार पर मिलेगी राहत
सीईओ राकेश कुमार सिंह ने अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि सभी मामलों का व्यवस्थित रिकॉर्ड तैयार कर श्रेणीवार समीक्षा की जाए। उन्होंने कहा कि रिकॉर्ड के आधार पर ही यह तय किया जाएगा कि किस किसान को किस प्रकार की राहत दी जा सकती है। प्राधिकरण का लक्ष्य है कि वास्तविक हकदार किसानों को उनकी आबादी की जमीन वापस मिले और वर्षों से चले आ रहे विवादों का स्थायी समाधान हो सके।

