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गोरखपुर एम्स की खुली पोल, कार्यकारी निदेशक को ही जांच के लिए जाना पड़ा निजी अस्पताल, जानें मामला

गोरखपुर एम्स की खुली पोल

गोरखपुर एम्स की खुली पोल

Uttar Pradesh News: गोरखपुर एम्स की स्वास्थ्य व्यवस्था पर अब तक सबसे बड़ा सवाल खड़ा हो गया है, जिस संस्थान को पूर्वांचल और पश्चिमी बिहार के करोड़ों लोगों के लिए बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं की उम्मीद बनाकर तैयार किया गया था, उसी संस्थान की कार्यकारी निदेशक को इलाज के लिए निजी अस्पताल का रुख करना पड़ा। जी हां! यह कोई आम मरीज नहीं, बल्कि गोरखपुर एम्स की कार्यकारी निदेशक मेजर जनरल (सेवानिवृत्त) डॉ. विभा दत्ता हैं। बुधवार को अचानक तबीयत बिगड़ने और बेहोश होने के बाद उन्हें एम्स की इमरजेंसी में ले जाया गया। शुरुआती जांच और उपचार के बाद हृदय संबंधी जांच की सलाह दी गई। लेकिन एम्स में कैथ लैब की सुविधा उपलब्ध नहीं होने के कारण उन्हें एंबुलेंस से निजी अस्पताल पहुंचाया गया। वहां उनकी जांच रिपोर्ट सामान्य आई और अगले दिन उन्होंने कार्यालय में कामकाज भी किया। अब इस पूरी घटना ने गोरखपुर एम्स की चिकित्सा सुविधाओं, संसाधनों और प्रशासनिक तैयारियों को लेकर एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है।

1,011 करोड़ की परियोजना, लेकिन जरूरी चिकित्सा सुविधा का इंतजार

दरअसल गोरखपुर एम्स की स्थापना के लिए केंद्र सरकार ने लगभग 1,011 करोड़ रुपये की परियोजना को मंजूरी दी थी। मूल योजना में 750 बेड का अस्पताल, इमरजेंसी, ट्रॉमा सेंटर, आईसीयू और सुपर स्पेशियलिटी सेवाओं की परिकल्पना की गई थी। इस संस्थान से पूर्वी उत्तर प्रदेश के 14 जिलों और पश्चिमी बिहार के पांच जिलों तक के लोगों को बेहतर इलाज मिलने की उम्मीद थी। लेकिन इतने बड़े संस्थान में कैथ लैब जैसी महत्वपूर्ण सुविधा का उपलब्ध नहीं होना अपने आप में गंभीर सवाल है। कैथ लैब हृदय रोगियों के उपचार और एंजियोग्राफी जैसी महत्वपूर्ण प्रक्रियाओं के लिए आवश्यक होती है। ऐसे में जब गंभीर हृदय रोग से जुड़े मरीजों को दूसरे अस्पतालों का रुख करना पड़े, तो एम्स की सुपर स्पेशियलिटी सेवाओं के दावों की समीक्षा जरूरी हो जाती है।

सितंबर तक कैथ लैब शुरू करने का दावा, अक्टूबर में भी सुविधा का इंतजार

सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि यह सुविधा आखिर कब शुरू होगी? जुलाई 2026 में एम्स के अध्यक्ष प्रो. हेमंत कुमार की ओर से कैथ लैब, रोबोटिक सर्जरी और आईवीएफ जैसी सुविधाएं सितंबर तक शुरू करने की बात सामने आई थी।लेकिन अक्टूबर का महीना भी समाप्त होने को है और कार्यकारी निदेशक को ही हृदय संबंधी जांच के लिए निजी अस्पताल जाना पड़ा। ऐसे में एम्स प्रशासन को स्पष्ट करना चाहिए कि सितंबर तक सुविधा शुरू करने की घोषणा के बावजूद कैथ लैब अब तक मरीजों के लिए उपलब्ध क्यों नहीं हो सकी? क्या मशीनों की खरीद में देरी हुई? क्या तकनीकी प्रक्रिया अधूरी है? क्या विशेषज्ञ डॉक्टरों और प्रशिक्षित कर्मचारियों की कमी है? या फिर इसके पीछे कोई दूसरी प्रशासनिक वजह है? इन सवालों का जवाब अब सार्वजनिक होना चाहिए।

जब संस्थान की मुखिया को ही बाहर जाना पड़ा, तो आम मरीजों का क्या होगा?

इस घटना का सबसे चिंताजनक पहलू आम मरीजों से जुड़ा है।एम्स में इलाज की उम्मीद लेकर पहुंचने वाला गरीब और मध्यमवर्गीय परिवार आखिर कहां जाए, जब उसे किसी गंभीर बीमारी में जरूरी जांच या उपचार के लिए दूसरे अस्पताल भेज दिया जाए? हर मरीज के पास निजी अस्पताल में लाखों रुपये खर्च करने की क्षमता नहीं होती। एम्स जैसे सरकारी संस्थान का उद्देश्य ही यह है कि आर्थिक रूप से कमजोर मरीजों को भी आधुनिक और विशेषज्ञ चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराई जा सकें। लेकिन अगर जरूरी सुविधाओं की कमी के कारण मरीजों को रेफर करना पड़े, तो इस व्यवस्था की जवाबदेही तय होनी ही चाहिए।

डॉक्टरों के पद, सुपर स्पेशियलिटी और इमरजेंसी आखिर कहां अटक रही व्यवस्था?

सवाल सिर्फ कैथ लैब का नहीं है। संस्थान में विशेषज्ञ चिकित्सकों की उपलब्धता, स्वीकृत और रिक्त पदों की स्थिति, इमरजेंसी में संसाधन, आधुनिक जांच उपकरण और सुपर स्पेशियलिटी विभागों की वास्तविक कार्यक्षमता की भी समीक्षा होनी चाहिए। एम्स की आधिकारिक वेबसाइट पर विभिन्न फैकल्टी और नॉन-फैकल्टी पदों के लिए भर्ती संबंधी विज्ञापन भी जारी किए गए हैं। ऐसे में यह जानना जरूरी है कि कितने पद स्वीकृत हैं, कितने भरे हुए हैं और किन विभागों में विशेषज्ञों की कमी बनी हुई है। आखिर मरीजों को जिन सुविधाओं के नाम पर एम्स तक लाया जाता है, उन सुविधाओं की जमीनी हकीकत क्या है?

करोड़ों का बजट, बड़े-बड़े दावे जवाबदेही किसकी?

अब सबसे बड़ा सवाल एम्स प्रशासन और जिम्मेदार अधिकारियों से है। 1,011 करोड़ रुपये की स्वीकृत परियोजना के तहत तैयार हुए इस संस्थान में चिकित्सा सुविधाओं की वर्तमान स्थिति क्या है? परियोजना पर अब तक वास्तविक रूप से कितना खर्च हुआ है? कितनी सुविधाएं पूरी तरह संचालित हैं? कितनी सुविधाएं अभी शुरू होनी बाकी हैं? कैथ लैब की खरीद, स्थापना और संचालन की समयसीमा क्या है? इन सभी सवालों पर प्रशासन को आंकड़ों के साथ जवाब देना चाहिए। गोरखपुर एम्स केवल एक अस्पताल नहीं, बल्कि पूर्वांचल के करोड़ों लोगों की उम्मीद है। इस संस्थान के निर्माण के पीछे उद्देश्य था कि गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए लोगों को दिल्ली, लखनऊ या दूसरे बड़े शहरों की दौड़ न लगानी पड़े।लेकिन कार्यकारी निदेशक विभा दत्ता को ही हृदय संबंधी जांच के लिए निजी अस्पताल जाना पड़े और कैथ लैब जैसी महत्वपूर्ण सुविधा की अनुपलब्धता सामने आए, तो सवाल उठना लाजिमी है।

हालांकि कार्यकारी निदेशक की जांच रिपोर्ट सामान्य आई है और उनके स्वास्थ्य को लेकर एम्स की ओर से भी स्थिति स्पष्ट की गई है। लेकिन इस घटना ने संस्थान की सुविधाओं की समीक्षा की जरूरत को और गंभीर बना दिया है।अब एम्स प्रशासन को केवल उपलब्धियों की सूची नहीं, बल्कि अधूरी सुविधाओं का पूरा हिसाब भी देना होगा। आखिर कैथ लैब कब शुरू होगी। मरीजों को जरूरी इलाज के लिए बाहर कब तक जाना पड़ेगा? रिक्त पद कब भरे जाएंगे? और सबसे अहम सवाल करोड़ों लोगों की उम्मीद बने गोरखपुर एम्स की व्यवस्था की जवाबदेही आखिर किसकी है?* इन सवालों का जवाब अब सिर्फ मरीज और उनके तीमारदार नहीं, बल्कि पूरा पूर्वांचल मांग रहा है।

रिपोर्ट: अंकित श्रीवास्तव

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