कानपुर। उत्तर प्रदेश की राज्यपाल एवं राज्य विश्वविद्यालयों की कुलाधिपति श्रीमती आनंदीबेन पटेल की अध्यक्षता में जन भवन, उत्तर प्रदेश एवं छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय, कानपुर के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित दो दिवसीय ‘एआई मंथन 2.0’ के दूसरे दिन कृत्रिम बुद्धिमत्ता के व्यावहारिक उपयोग, नवाचार और भविष्य की संभावनाओं पर विशेषज्ञों ने मंथन किया।विश्वविद्यालय परिसर स्थित वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई सभागार में आयोजित विभिन्न सत्रों में विशेषज्ञों ने शिक्षा, कृषि, शहरी विकास, प्रतियोगी परीक्षाओं और तकनीकी आत्मनिर्भरता जैसे क्षेत्रों में AI की भूमिका पर विस्तार से चर्चा की।
AI शिक्षा का सहायक बने, मालिक नहीं
प्रथम सत्र में बिट्स पिलानी के प्रो. वी. राम गोपाल राव ने उच्च शिक्षा में AI के इस्तेमाल पर जोर देते हुए कहा कि विश्वविद्यालयों में AI का उपयोग सेवक और सहायक के रूप में होना चाहिए, न कि उसे मनुष्य का मालिक बनने दिया जाए।उन्होंने कहा कि AI के माध्यम से व्यक्तिगत शिक्षा, भाषा सहायता, शोध और विद्यार्थियों की उत्पादकता को बेहतर बनाया जा सकता है। बदलती तकनीक के दौर में विश्वविद्यालयों को विद्यार्थियों को केवल डिग्री देने के बजाय जीवनभर सीखने के अवसर उपलब्ध कराने चाहिए।उन्होंने विद्यार्थियों के मूल्यांकन में केवल अंतिम उत्तर की जगह उनके तर्क, प्रयास और समस्या समाधान की प्रक्रिया को महत्व देने की बात कही। साथ ही शोध को केवल शोधपत्र और पेटेंट तक सीमित न रखकर उसे प्रोटोटाइप, उत्पाद और स्टार्टअप में बदलने पर जोर दिया।
UP को AI स्किल का बड़ा केंद्र बनाने की जरूरत
आईबीएम के विशाल चहल ने भारत में AI के बढ़ते प्रभाव और तकनीकी प्रतिभा की जरूरत पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि AI की क्षमता तेजी से बढ़ रही है, लेकिन इसके व्यापक स्तर पर इस्तेमाल और पर्याप्त प्रतिभा तैयार करना भारत के सामने बड़ी चुनौती है।उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश में बड़ी छात्र आबादी को देखते हुए राज्य को AI कौशल विकास का प्रमुख केंद्र बनाया जा सकता है।विशाल चहल ने AI के साथ मानवीय निर्णय, जवाबदेही, विशेषज्ञता, विश्वास, सुरक्षा और सुशासन की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने विश्वविद्यालयों में केवल AI या कंप्यूटर लैब बनाने के बजाय उत्कृष्टता केंद्र (Centres of Excellence) विकसित करने का सुझाव दिया।उन्होंने ‘सॉवरेन AI’ को भारत के तकनीकी भविष्य के लिए महत्वपूर्ण बताते हुए स्थानीय प्रतिभा, डेटा, मॉडल, हार्डवेयर और सुरक्षित डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करने की आवश्यकता बताई।
AI से प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी होगी आसान
आईआईटी कानपुर के प्रो. अमय करकरे ने AI आधारित ऑनलाइन शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी को अधिक सुलभ बनाने पर चर्चा की।‘प्रोजेक्ट साथी’ का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए दूरदराज के विद्यार्थियों तक गुणवत्तापूर्ण परीक्षा तैयारी पहुंचाई जा सकती है।उन्होंने कहा कि निशुल्क ऑनलाइन शिक्षा में सिर्फ अध्ययन सामग्री उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं है। विद्यार्थियों की पढ़ाई जारी रखने के लिए निरंतर फॉलोअप, व्यक्तिगत मार्गदर्शन और समय पर सहायता जरूरी है।उन्होंने AI ट्यूटर को विद्यार्थियों को सीधे उत्तर देने के बजाय संकेत और मार्गदर्शन देने की बात कही, ताकि विद्यार्थी स्वयं समस्या का समाधान करना सीखें।
AI बदलेगा कृषि अनुसंधान का तरीका
भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली के डॉ. बोड्डुपल्ली मारुति प्रसन्ना ने AI-संचालित फसल प्रजनन और कृषि आर्थिक प्रबंधन पर विचार रखे।उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन, जल और पोषक तत्वों की कमी, बढ़ती कृषि लागत, कीट-रोग और पौष्टिक भोजन की वहनीयता जैसी चुनौतियों से निपटने में AI महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।AI के जरिए फसल प्रजनन चक्र को कम करने, अलग-अलग आंकड़ों को एकीकृत करने और जलवायु तथा कीट-रोगों पर तेजी से प्रतिक्रिया देने में मदद मिल सकती है।उन्होंने कृषि अनुसंधान के लिए गुणवत्तापूर्ण और AI-Ready Data की जरूरत पर जोर दिया। जीनोमिक डेटा, पर्यावरणीय आंकड़े, ड्रोन आधारित फेनोटाइपिंग और इमेज प्रोसेसिंग के जरिए बेहतर फसल किस्में विकसित करने की संभावनाएं भी उन्होंने बताईं।डॉ. प्रसन्ना ने स्पष्ट किया कि AI कृषि वैज्ञानिकों की जगह नहीं लेगा, बल्कि वैज्ञानिकों के काम करने के तरीके को बदलेगा।
AI से बनेंगे ज्यादा स्मार्ट और टिकाऊ शहर
आईआईटी कानपुर के प्रो. सचिदानंद त्रिपाठी ने ‘टिकाऊ शहरों के लिए AI’ विषय पर चर्चा की।उन्होंने कहा कि AI के माध्यम से शहरों को अधिक कुशल, लचीला और संसाधन-सक्षम बनाया जा सकता है। शहरी क्षेत्रों में बड़ी मात्रा में डेटा उपलब्ध होने के बावजूद विभागों के बीच समन्वय की कमी और डेटा के अलग-अलग सिस्टम में बंटे होने के कारण उसका प्रभावी इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है।
उन्होंने वायु गुणवत्ता, शहरी बाढ़ और सार्वजनिक परिवहन में AI के उपयोग के उदाहरण दिए।कानपुर में AI आधारित वायु गुणवत्ता निर्णय सहायता प्रणाली के जरिए प्रदूषण के हॉटस्पॉट और संभावित स्रोतों की पहचान की जा रही है। वहीं, AI आधारित परिवहन प्रणालियों के जरिए बस रूट को बेहतर बनाने और यात्रियों के आवागमन समय को कम करने की दिशा में काम किया जा रहा है।बाढ़ प्रबंधन में भी AI और सेंसर आधारित तकनीक का इस्तेमाल कर स्थानीय स्तर पर बाढ़ की गहराई और जोखिम का अनुमान लगाने की संभावनाओं पर काम किया जा रहा है।विशेषज्ञों ने कहा कि भविष्य के टिकाऊ शहरों के लिए डेटा, AI मॉडल और भौतिक इंफ्रास्ट्रक्चर को एक साथ जोड़ना जरूरी होगा।
‘AI मंथन 2.0’ के दूसरे दिन की चर्चाओं में यह संदेश प्रमुखता से सामने आया कि AI केवल भविष्य की तकनीक नहीं, बल्कि शिक्षा, कृषि, शहरी विकास और प्रशासन में वर्तमान की जरूरत बनती जा रही है। जरूरत इस बात की है कि इसका इस्तेमाल जिम्मेदारी, सुरक्षा और मानवीय मूल्यों के साथ किया जाए।

