Site icon UP की बात

वाराणसी में अनोखी मसान होली, चिता की भस्म से खेला गया पर्व, शिवबारात में उमड़ा आस्था का सैलाब

बाबा विश्वनाथ की नगरी Varanasi में होली का पर्व एक अनोखे और रहस्यमय रूप में मनाया जाता है, जिसे मसान होली कहा जाता है। यहां रंग और गुलाल की जगह चिता की भस्म से होली खेली जाती है। मणिकर्णिका घाट और हरिश्चंद्र घाट पर सदियों पुरानी इस परंपरा को देखने के लिए देश-विदेश से श्रद्धालु और पर्यटक पहुंचते हैं।

श्मशान घाट पर भस्म से खेली जाती है होली

मसान होली के दौरान मणिकर्णिका घाट और हरिश्चंद्र घाट पर जलती चिताओं की भस्म से होली खेली जाती है। साधु-संत, नागा बाबा और शिव भक्त भस्म लगाकर “हर-हर महादेव” के जयघोष के साथ इस अनूठे उत्सव में शामिल होते हैं। यह पर्व जीवन और मृत्यु के सत्य का प्रतीक माना जाता है, जहां आनंद और वैराग्य एक साथ दिखाई देते हैं।

रंगभरी एकादशी से जुड़ी है पौराणिक मान्यता

पौराणिक मान्यता के अनुसार फाल्गुन मास की रंगभरी एकादशी पर भगवान शिव माता पार्वती को विदा कर पहली बार काशी आए थे। अपने सभी गणों और भक्तों को साथ लेने के लिए वे श्मशान घाट पहुंचे और वहीं भस्म से होली खेली। तभी से काशी में मसान होली की परंपरा चली आ रही है, जो आज भी पूरी श्रद्धा और आस्था के साथ निभाई जाती है।

एक किलोमीटर लंबी निकली शिवबारात

मसान होली के अवसर पर करीब एक किलोमीटर लंबी शिवबारात निकाली गई, जिसमें बड़ी संख्या में शिव भक्त शामिल हुए। डमरू, शंख, घंटा-घड़ियाल और ढोल-नगाड़ों की गूंज के बीच शिवबारात ने पूरे क्षेत्र को भक्तिमय बना दिया। शिवभक्त भस्म, त्रिशूल और शिव के विभिन्न स्वरूपों के साथ बारात में नृत्य करते नजर आए।

आस्था, परंपरा और वैराग्य का अद्भुत संगम

मसान होली केवल उत्सव नहीं, बल्कि काशी की आध्यात्मिक चेतना और शैव परंपरा का प्रतीक है। यहां मृत्यु का भय नहीं, बल्कि उसे उत्सव के रूप में स्वीकार करने की भावना दिखाई देती है। यही कारण है कि काशी की मसान होली दुनियाभर में अपनी अनूठी पहचान रखती है।

Exit mobile version